दिक्कतों का सामना कर रही हैं भोटिया जनजाति

दिक्कतों का सामना कर रही हैं भोटिया जनजाति

रंजना ठाकुर

चमोली (उत्तराखंड): उत्तराखंड देवताओं का प्रदेश माना जाता है। कभी उत्तर प्रदेश का हिस्सा रहे उत्तराखंड में में कई जनजातियां रहती हैं लेकिन आबादी के लिहाज से 5 प्रमुख जनजातियां मानी गई हैं इनमें से एक है भोटिया जनजाति । भोटिया समाज के लोग उत्तराखंड के तीन जिलों उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़ में रहते हैं। परंपरागत तौर पर ये खानाबदोश जनजाति है । खानाबदोश यानि जिनका निश्चित ठिकाना ना हो हालांकि इनकी जीवनशैली में अब बहुत फर्क आ गया है ।

पहले भोटिया जनजाति के लोग जहां भी पड़ाव डालते थे वो उनका अस्थाई ठिकाना होता था। लकड़ी, घास- फूस से बनी झोपड़ी में रहते थे और जब वहां से जाते थे अपना सामान निकालकर उन झोपड़ियों को आग लगा देते थे । अगली बार कहीं और उनका ठिकाना होता था लेकिन अब ऐसा नहीं है। इन्होंने भारत-चीन सीमा पर माणा नीति, घमशाली, बम्पा जैसे गांव हों या फिर निचले इलाकों के बिरहई, छिनका, भीमतला, घिंगराण जैसे गांव हों ।

इन्होंने पक्के मकान बना लिए हैं लेकिन खानाबदोशों की तरह ये आज भी मौसम के हिसाब से ठिकाने बदलते हैं। गर्मियां शुरु होते हीं ये ऊंचे इलाकों का रुख करते हैं वहीं सर्दियां शुरु होते ही जब सीमांत गांवों में बर्फबारी शुरु हो जाती है तो ये अपेक्षाकृत गर्म इलाकों में उतर आते हैं । ऐसा ये महज अपनी परंपरा को बनाए रखने के लिए करते हैं ।

खानाबदोश होते हुए भी ये काफी समृद्ध हैं। बाकी जनजातियों के मुकाबले भोटिया समाज की हालत काफी बेहतर है। पहले तिब्बत के साथ व्यापार से हुई आमदनी से ये जीवनयापन करते थे । भोटिया जनजाति के लोग यहां से ऊनी कपड़े और नमक आदि ले जाकर तिब्बत में बेचते थे। इस व्यापार में भाषा भी कभी आड़े नहीं आती थी। भोटिया जनजाति के लोग मनमाफिक कीमत ना मिलने तक अपने हाथों से सामान को ढक लिया करते थे । जब मनमाफिक कीमत मिल जाती थी तभी वो सामान दिया करते थे लेकिन 1962 में चीन के साथ युद्ध के बाद पारंपरिक रूप से चला आ रहा ये व्यापारिक रिश्ता खत्म हो गया ।


ऐसे में ये अपना सामान आसपास की आबादी को बेचने के लिए मजबूर हो गए हालांकि इन्होंने अभी तक अपना पारंपरिक व्यवसाय नहीं छोड़ा है । इऩके गावों में हर घर में रांच होती है । जिस पर ये वॉल हैंगिंग, कालीन जैसी तमाम चीजें बनाते हैं । ऊनी कपड़े बनाने में भी ये माहिर हैं लेकिन अपना सामान बेचने में इन्हें कई तरह के समझौते करने पड़ते हैं । कोई ठोस व्यापारिक नीति नहीं होने और सरकारी मदद नहीं होने की वजह से धीरे धीरे इस व्यापार पर असर पड़ने लगा है ।


महंगाई बढ़ने की वजह से कच्चा माल महंगा हो गया और लागत बढ़ गई है जबकि खरीदार कम हो रहे हैं। बाज़ार में बाहर से आया सस्ता माल भी बिक्री में गिरावट की बड़ी वजह है। इन सबके बावजदू हिमालय की चोटी पर मिलने वाली जड़ी बूटियों की पहचान इस जनजाति के कई लोगों के लिए वरदान साबित हो रही है। इस जनजाति से जुड़े लोग ऐसी जड़ी बूटियों को ऊंचे दामों पर बेच कर अच्छी खासी कमाई कर लेते हैं । हालांकि ऐसे लोगों की संख्या काफी कम है ।


भोटिया जनजाति के लोग आर्थिक रूप से मजबूत होते हुए भी कई तरह की दिक्कतों का सामना कर रहे हैं । विषम भौगोलिक परिस्थितियों में रहने वाली ये जनजाति कई मुद्दों पर सरकारी उपेक्षा का सामना कर रही है । भोटिया जनजाति के लोग भारत-चीन सीमा के बेहद करीब रहते हैं। ये इलाके सुरक्षा के लिहाज से काफी संवेदनशील माने जाते हैं।

हिमालय की पहाड़ियां और ITBP के जवानों के बाद भोटिया जनजाति ही पड़ोसी देशों के सामने सुरक्षा पंक्ति का काम करती है । ऐसे में इनका सशक्त होना काफी अहम होता है । हमेशा से नीति और माणा कि घाटियों में रहने वाले इन लोगों को कई ऐसे दुर्गम रास्तों की जानकारी होती है जो सामरिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। ऐसे में ये आर्मी के लिए भी मददगार हैं लेकिन इन्हें इस बात का मलाल है कि सरकार को शायद इसका अहसास नहीं है।

भोटिया अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में आते हैं । इसकी वजह से उत्तराखंड में सरकारी नौकरियों में इन्हें 2 फीसदी आरक्षण मिलता है । जिसकी बदौलत इस जनजाति के काफी लोग सरकारी नौकरियों में हैं। इनमें शिक्षा को लेकर भी खासी जागरुकता है। तकरीबन 90 फीसदी लोग शिक्षित हैं लेकिन इन्हें मलाल है कि उच्च शिक्षा के लिए हमेशा इनके बच्चों को बाहर जाना पड़ता है । शिक्षा के लिए इनके गांवों से बड़ी संख्या में पलायन होता है । स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर भी इनमें खासी नाराजगी दिखती है। जिन इलाकों में ये जनजाति रहती है उनमें स्वास्थ्य सेवाओं की भारी कमी है। खासकर माणा और नीति घाटी के गांवों में गर्मियों में इस जनजाति के ज्यादातर लोग इन्हीं गांवों में रहते हैं । लेकिन यहां स्वास्थ्य सेवाएं ना के बराबर हैं । ऐसे में इस इलाके में तैनात ITBP के जवान इनका सहारा होते हैं। इनकी तरफ से लगाए गए हेल्थ कैंप ही इनकी एकमात्र उम्मीद होती है।

भोटिया जनजाति की सबसे खूबसूरत बात है अपनी परंपराओं से उनका लगाव पीढ़ी दर पीढ़ी ये अपनी परंपराओं को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं । खास मौकों पर ये अपनी पारंपरिक वेशभूषा में नज़र आते हैं । घर में धार्मिक अनुष्ठान या शादी ब्याह जैसे खुशी के मौकों पर गांव के सभी लोग मिलकर पौना नृत्य करते हैं । गांव के ही कुछ कलाकार मिलकर मूशक बाजा ढोल और दमाउ बजाते हैं और इनकी धुन पर सभी एक साथ थिरकते हैं । इस नृत्य की खूबसूरती। इनके पारंपरिक वेशभूषा की वजह से कई गुना बढ़ जाती है ।

इस परंपरागत नृत्य में सभी उम्र के लोग पूरी तरह से पारंपरिक परिधानों में होते हैं खासकर महिलाएं काले और सफेद रंग के परिधान खास तरह के गहने पहनती हैं। सुहागिन महिलाएं नाक में बड़ी सी नथ पहनती हैं जिसे बुलाक कहते हैं। इसके अलावा मुरकी, हांसुली, धाकुली, चंद्राहार, जंजीर, चिमटा, सुंवर दांत, कनकौरी और चाकू गहना जैसे तमाम गहने पहनकर महिलाएं खास मौकों के लिए तैयार होती हैं । दरअसल यही मौके होते हैं जब आधुनिक जीवन शैली की दौड़ में खुद को बनाए रखने की कोशिश में लगे ये लोग अपनी परंपरा और संस्कृति को जीते हैं ।

First Published: Friday, December 7, 2012, 16:16

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